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Friday, June 17, 2016

मेरी धड़कन भी मुझको....मनाती रही

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मेरी धड़कन भी मुझको....मनाती रही,
चुप थी बे-दर्दी......मुझको रुलाती रही |

दिल था टूटा मगर......मैं न टूटा कभी ,
बे-वफ़ा थी जो नज़रें........चुराती रही |

इक खलिश थी मुझे, उसको भी रंज था,
जाने फिर क्यूँ वो...मातम मनाती रही |

बात जो कुछ भी थी....बीच उसके मेरे,
बे-वफ़ा गैरों को क्यूँ.........बताती रही |

मैं था मायूस सोचा न......लौटेंगे फिर,
पर वो आँखों में बन अश्क आती रही |

हर्ष महाजन


212-212-212-212
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
*छोड़ दे सारी दुनियां किसी के लिए*